गुरुवार, 16 जुलाई 2015

लक्ष्मी माता की आरती

ॐ जय लक्ष्मी माता, मैया जय लक्ष्मी माता
तुम को निस दिन सेवत, मैयाजी को निस दिन सेवत 
हर विष्णु विधाता.. ॐ जय लक्ष्मी माता॥ ...

उमा रमा ब्रह्माणी, तुम ही जग माता, ओ मैया तुम ही जग माता 
सूर्य चन्द्र माँ ध्यावत, नारद ऋषि गाता॥…..ॐ जय लक्ष्मी माता 

दुर्गा रूप निरन्जनि, सुख सम्पति दाता, ओ मैया सुख सम्पति दाता 
जो कोई तुम को ध्यावत, ऋद्धि सिद्धि धन पाता॥.…ॐ जय लक्ष्मी माता 

तुम पाताल निवासिनि, तुम ही शुभ दाता, ओ मैया तुम ही शुभ दाता 
कर्म प्रभाव प्रकाशिनि, भव निधि की दाता॥….ॐ जय लक्ष्मी माता 

जिस घर तुम रहती तहँ सब सद्गुण आता, ओ मैया सब सद्गुण आता 
सब संभव हो जाता, मन नहीं घबराता॥…ॐ जय लक्ष्मी माता

तुम बिन यज्ञ न होते, वस्त्र न कोई पाता, ओ मैया वस्त्र न कोई पाता 
ख़ान पान का वैभव, सब तुम से आता॥….ॐ जय लक्ष्मी माता 

शुभ गुण मंदिर सुंदर, क्षीरोदधि जाता, ओ मैया क्षीरोदधि जाता 
रत्न चतुर्दश तुम बिन, कोई नहीं पाता ॥….ॐ जय लक्ष्मी माता 

महा लक्ष्मीजी की आरती, जो कोई जन गाता, ओ मैया जो कोई जन गाता 
उर आनंद समाता, पाप उतर जाता॥…. ॐ जय लक्ष्मी माता ॥

श्री रामाष्टक

हे रामा पुरुषोत्तमा नरहरे नारायणा केशव ।
गोविन्दा गरुड़ध्वजा गुणनिधे दामोदरा माधवा ॥
हे कृष्ण कमलापते यदुपते सीतापते श्रीपते ।
बैकुण्ठाधिपते चराचरपते लक्ष्मीपते पाहिमाम ॥

आदौ रामतपोवनादि गमनं हत्वा मृगं कांचनम ।
वैदेही हरणं जटायु मरणं सुग्रीव सम्भाषणम ॥
बालीनिर्दलनं समुद्रतरणं लंकापुरीदाहनम ।
पश्चाद्रावण कुम्भकर्णहननं एतद्घि रामायणम ॥
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दिनेशवंशभूषणं समग्रलोकनायकम्।
समस्तमोदवर्धकं नममि भक्त पालकम्॥१॥
सुबाहुदर्पखण्डनं महेशचाप भंजनम्।
विदेहचित्तरंजनं नममि जानकीपतिम्॥२॥
मनोजगर्वमोचनं नवीन मेघशोभनम्।
प्रलम्बबाहुसुन्दरं नमामि चित्त मोहनम्॥३॥
मुखारविन्दशोभनं विशाल दिव्यलोचनम्।
सदासुखैकदायकं नममि रामनागरम्॥४॥
सुरारिवृन्दमर्दनं समग्रलोकरक्षकम्॥
समस्त पापखण्डनं नमामि शोक मोचनम्॥५॥
धराभरावतारकं समस्तलोकपालकम्।
समस्तजीवपोषणं नमामि दीनवत्सल्म्॥६॥
भवाब्धि घोरपारकं समग्रदोषशोषणम्।
स्वबन्धुदुःखनाशनं नमामि भक्तवत्सलम्॥७॥
तपोवने विहारिणं मुनीन्द्रवृन्दसेवितम्।
स्वभक्त मोक्षदायिनं नमामि नित्यराघवम्॥८॥
रामाष्टकमिदं पुण्यं नरो यः प्रत्यहं पठेत्।
पुण्यावाप्तिर्भवेत्तस्य रामवनस्य दर्शनात्॥

राधा जी की आरती

आरती श्री वृषभानुसुता की । मंजु मूर्ति मोहन ममताकी ॥ टेक ॥

त्रिविध तापयुत संसृति नाशिनि, विमल विवेकविराग विकासिनि ।
पावन प्रभु पद प्रीति प्रकाशिनि, सुन्दरतम छवि सुन्दरता की ॥

मुनि मन मोहन मोहन मोहनि, मधुर मनोहर मूरती सोहनि ।
अविरलप्रेम अमिय रस दोहनि, प्रिय अति सदा सखी ललिताकी ॥

संतत सेव्य सत मुनि जनकी, आकर अमित दिव्यगुन गनकी ।
आकर्षिणी कृष्ण तन मनकी, अति अमूल्य सम्पति समता की ॥

कृष्णात्मिका, कृषण सहचारिणि, चिन्मयवृन्दा विपिन विहारिणि ।
जगज्जननि जग दुःखनिवारिणि, आदि अनादिशक्ति विभुताकी ॥

श्रीअम्बाजी की आरती


सर्वमंगल मांग्लयै , शिवे सर्वार्थसाधिके ।
शरण्ये त्र्यम्बिके गौरी , नारायणी नमोऽस्तुते ॥
जय अम्बे गौरी, मैया जय श्यामा गौरी तुम को निस दिन ध्यावत
मैयाजी को निस दिन ध्यावत हरि ब्रह्मा शिवजी ॥…. जय अम्बे गौरी ॥

माँग सिन्दूर विराजत टीको मृग मद को ।मैया टीको मृगमद को
उज्ज्वल से दो नैना चन्द्रवदन नीको॥ ….जय अम्बे गौरी ॥

कनक समान कलेवर रक्ताम्बर साजे। मैया रक्ताम्बर साजे
रक्त पुष्प गले माला कण्ठ हार साजे॥…. जय अम्बे गौरी ॥

केहरि वाहन राजत खड्ग कृपाण धारी। मैया खड्ग कृपाण धारी
सुर नर मुनि जन सेवत तिनके दुख हारी॥ ….जय अम्बे गौरी ॥

कानन कुण्डल शोभित नासाग्रे मोती। मैया नासाग्रे मोती
कोटिक चन्द्र दिवाकर सम राजत ज्योति॥ ….जय अम्बे गौरी ॥

शम्भु निशम्भु बिडारे महिषासुर घाती। मैया महिषासुर घाती
धूम्र विलोचन नैना निशदिन मदमाती॥ ….जय अम्बे गौरी ॥

चण्ड मुण्ड शोणित बीज हरे। मैया शोणित बीज हरे
मधु कैटभ दोउ मारे सुर भयहीन करे॥….जय अम्बे गौरी ॥

ब्रह्माणी रुद्राणी तुम कमला रानी। मैया तुम कमला रानी
आगम निगम बखानी तुम शिव पटरानी॥…. जय अम्बे गौरी ॥

चौंसठ योगिन गावत नृत्य करत भैरों। मैया नृत्य करत भैरों
बाजत ताल मृदंग और बाजत डमरू॥ ….जय अम्बे गौरी ॥

तुम हो जग की माता तुम ही हो भर्ता। मैया तुम ही हो भर्ता
भक्तन की दुख हर्ता सुख सम्पति कर्ता॥…. जय अम्बे गौरी ॥

भुजा चार अति शोभित वर मुद्रा धारी। मैया वर मुद्रा धारी
मन वाँछित फल पावत देवता नर नारी॥ ….जय अम्बे गौरी ॥

कंचन थाल विराजत अगर कपूर बाती। मैया अगर कपूर बाती
माल केतु में राजत कोटि रतन ज्योती॥…. बोलो जय अम्बे गौरी ॥

माँ अम्बे की आरती जो कोई नर गावे। मैया जो कोई नर गावे
कहत शिवानन्द स्वामी सुख सम्पति पावे॥…. जय अम्बे गौरी ॥
~~देवी वन्दना~~
या देवी सर्वभूतेषु शक्तिरूपेण संस्थिता । 
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम: ॥

स्तुति गणपती जी की

मन्त्रहीनं क्रियाहीनं यत पूजनं हरे: । 
सर्वं सम्पूंर्णतामेति कृते नीराजने शिवे ॥
पूजन मन्त्रहीन और क्रियाहीन होने पर भी नीराजन (आरती) कर लेने से उसमें सारी पूर्णता आ जाती है। आरती में पहले मूलमन्त्र जिस देवता का जिस मन्त्र से पूजन किया गया हो, उस मन्त्र के द्वारा तीन बार पुष्पांजलि देनी चाहिये और ढोल, नगारे, शंख, घड़ियाल आदि महावाद्यों की ध्वनि तथा जय-जयकार के शब्द के साथ शुद्ध पात्र में घृत से या कपूर से विषम संख्या की अनेक बत्तियां जलाकर आरती करनी चाहिए ।

स्तुति गणपती जी की :

गणपति की सेवा मंगल मेवा सेवा से सब विध्न टरें।
तीन लोक तैंतीस देवता द्वार खड़े सब अर्ज करे ॥1

ऋद्धि-सिद्धि दक्षिण वाम विरजे आनन्द सौं चंवर दुरें ।
धूप दीप और लिए आरती भक्त खड़े जयकार करें ॥2

गुड़ के मोदक भोग लगत है मूषक वाहन चढ़े सरें ।
सौम्य सेवा गणपति की विध्न भागजा दूर परें ॥3

भादों मास शुक्ल चतुर्थी दोपारा भर पूर परें ।
लियो जन्म गणपति प्रभु ने दुर्गा मन आनन्द भरें ॥4

श्री शंकर के आनन्द उपज्यो, नाम सुमरयां सब विध्न टरें ।
आन विधाता बैठे आसन इन्द्र अप्सरा नृत्य करें ॥5

देखि वेद ब्रह्माजी जाको विध्न विनाशन रूप अनूप करें।
पग खम्बा सा उदर पुष्ट है चन्द्रमा हास्य करें ।
दे श्राप चन्द्र्देव को कलाहीन तत्काल करें ॥6

चौदह लोक में फिरें गणपति तीन लोक में राज करें ।
उठ प्रभात जो आरती गावे ताके सिर यश छत्र फिरें ॥7

गणपति जी की पूजा पहले करनी काम सभी निर्विध्न करें ।
श्री गणपति जी की हाथ जोड़कर स्तुति करें ॥8

शुक्रवार, 10 जुलाई 2015

Shiv Tandav Stotra (शिव ताण्डव स्तोत्र)


जटाटवीगलज्जलप्रवाहपावितस्थले 
गलेऽवलम्ब्यलम्बितां भुजङ्गतुङ्गमालिकाम्‌।
डमड्डमड्डमड्डमन्निनादवड्डमर्वयं 
चकारचण्डताण्डवं तनोतु नः शिवो शिवम्‌ ॥१॥
जिन शिव जी की सघन, वनरूपी जटा से प्रवाहित हो गंगा जी की धारायं उनके कंठ को प्रक्षालित होती हैं, जिनके गले में बडे एवं लम्बे सर्पों की मालाएं लटक रहीं हैं, तथा जो शिव जी डम-डम डमरू बजा कर प्रचण्ड ताण्डव करते हैं, वे शिवजी हमारा कल्यान करें ।

जटाकटाहसंभ्रमभ्रमन्निलिंपनिर्झरी 
विलोलवीचिवल्लरी विराजमानमूर्धनि।
धगद्धगद्धगज्ज्वलल्ललाटपट्टपावके 
किशोरचंद्रशेखरे रतिः प्रतिक्षणं ममं ॥२॥
जिन शिव जी के जटाओं में अतिवेग से विलास पुर्वक भ्रमण कर रही देवी गंगा की लहरे उनके शिश पर लहरा रहीं हैं, जिनके मस्तक पर अग्नि की प्रचण्ड ज्वालायें धधक-धधक करके प्रज्वलित हो रहीं हैं, उन बाल चंद्रमा से विभूषित शिवजी में मेरा अनुराग प्रतिक्षण बढता रहे।

धराधरेंद्रनंदिनी विलासबन्धुबन्धुर
स्फुरद्दिगंतसंतति प्रमोद मानमानसे।
कृपाकटाक्षधोरणीनिरुद्धदुर्धरापदि 
क्वचिद्विगम्बरे मनोविनोदमेतु वस्तुनि ॥३॥
जो पर्वतराजसुता (पार्वती जी) केअ विलासमय रमणिय कटाक्षों में परम आनन्दित चित्त रहते हैं, जिनके मस्तक में सम्पूर्ण सृष्टि एवं प्राणीगण वास करते हैं, तथा जिनके कृपादृष्टि मात्र से भक्तों की समस्त विपत्तियां दूर हो जाती हैं, ऐसे दिगम्बर (आकाश को वस्त्र सामान धारण करने वाले) शिवजी की आराधना से मेरा चित्त सर्वदा आन्दित रहे।

जटाभुजंगपिंगलस्फुरत्फणामणिप्रभा 
कदंबकुंकुमद्रवप्रलिप्तदिग्वधूमुखे।
मदांधसिंधुरस्फुरत्वगुत्तरीयमेदुरे 
मनोविनोदद्भुतं बिंभर्तुभूतभर्तरि ॥४॥
मैं उन शिवजी की भक्ति में आन्दित रहूँ जो सभी प्राणियों की के आधार एवं रक्षक हैं, जिनके जाटाओं में लिपटे सर्पों के फण की मणियों के प्रकाश पीले वर्ण प्रभा-समुहरूपकेसर के कातिं से दिशाओं को प्रकाशित करते हैं और जो गजचर्म से विभुषित हैं।

सहस्रलोचनप्रभृत्यशेषलेखशेखर 
प्रसूनधूलिधोरणी विधूसरांघ्रिपीठभूः।
भुजंगराजमालयानिबद्धजाटजूटकः 
श्रियैचिरायजायतां चकोरबंधुशेखरः ॥५॥
जिन शिव जी का चरण इन्द्र-विष्णु आदि देवताओं के मस्तक के पुष्पों के धूल से रंजित हैं (जिन्हे देवतागण अपने सर के पुष्प अर्पन करते हैं), जिनकी जटा पर लाल सर्प विराजमान है, वो चन्द्रशेखर हमें चिरकाल के लिए सम्पदा दें।

ललाटचत्वरज्वलद्धनंजयस्फुलिङ्गभा
निपीतपंचसायकंनमन्निलिंपनायकम्‌।
सुधामयूखलेखया विराजमानशेखरं 
महाकपालिसंपदे शिरोजटालमस्तुनः ॥६॥
जिन शिव जी ने इन्द्रादि देवताओं का गर्व दहन करते हुए, कामदेव को अपने विशाल मस्तक की अग्नि ज्वाला से भस्म कर दिया, तथा जो सभि देवों द्वारा पुज्य हैं, तथा चन्द्रमा और गंगा द्वारा सुशोभित हैं, वे मुझे सिद्दी प्रदान करें।

करालभालपट्टिकाधगद्धगद्धगज्ज्व
लद्धनंजया धरीकृतप्रचंडपंचसायके।
धराधरेंद्रनंदिनीकुचाग्रचित्रपत्रक
प्रकल्पनैकशिल्पिनी त्रिलोचनेरतिर्मम ॥७॥
जिनके मस्तक से धक-धक करती प्रचण्ड ज्वाला ने कामदेव को भस्म कर दिया तथा जो शिव पार्वती जी के स्तन के अग्र भाग पर चित्रकारी करने में अति चतुर है ( यहाँ पार्वती प्रकृति हैं, तथा चित्रकारी सृजन है), उन शिव जी में मेरी प्रीति अटल हो।

नवीनमेघमंडलीनिरुद्धदुर्धरस्फुर-
त्कुहुनिशीथनीतमः प्रबद्धबद्धकन्धरः।
निलिम्पनिर्झरीधरस्तनोतु कृत्तिसिंधुरः 
कलानिधानबंधुरः श्रियं जगंद्धुरंधरः ॥८॥
जिनका कण्ठ नवीन मेंघों की घटाओं से परिपूर्ण आमवस्या की रात्रि के सामान काला है, जो कि गज-चर्म, गंगा एवं बाल-चन्द्र द्वारा शोभायमान हैं तथा जो कि जगत का बोझ धारण करने वाले हैं, वे शिव जी हमे सभि प्रकार की सम्पनता प्रदान करें।

प्रफुल्लनीलपंकजप्रपंचकालिमप्रभा 
विडंबि कंठकंध रारुचि प्रबंधकंधरम्‌।
स्मरच्छिदं पुरच्छिंद भवच्छिदं मखच्छिदं 
गजच्छिदांधकच्छिदं तमंतकच्छिदं भजे ॥९॥
जिनका कण्ठ और कन्धा पूर्ण खिले हुए नीलकमल की फैली हुई सुन्दर श्याम प्रभा से विभुषित है, जो कामदेव और त्रिपुरासुर के विनाशक, संसार के दु:खो६ के काटने वाले, दक्षयज्ञ विनाशक, गजासुर एवं अन्धकासुर के संहारक हैं तथा जो मृत्यू को वश में करने वाले हैं, मैं उन शिव जी को भजता हूँ ।

अखर्वसर्वमंगला कलाकदम्बमंजरी 
रसप्रवाह माधुरी विजृंभणा मधुव्रतम्‌।
स्मरांतकं पुरातकं भावंतकं मखांतकं 
गजांतकांधकांतकं तमंतकांतकं भजे ॥१०॥
जो कल्यानमय, अविनाशि, समस्त कलाओं के रस का अस्वादन करने वाले हैं, जो कामदेव को भस्म करने वाले हैं, त्रिपुरासुर, गजासुर, अन्धकासुर के सहांरक, दक्षयज्ञविध्वसंक तथा स्वयं यमराज के लिए भी यमस्वरूप हैं, मैं उन शिव जी को भजता हूँ।

जयत्वदभ्रविभ्रमभ्रमद्भुजंगमस्फुर-
द्धगद्धगद्विनिर्गमत्कराल भाल हव्यवाट्।
धिमिद्धिमिद्धिमिध्वनन्मृदंगतुंगमंगल
ध्वनिक्रमप्रवर्तित: प्रचण्ड ताण्डवः शिवः ॥११॥
अतयंत वेग से भ्रमण कर रहे सर्पों के फूफकार से क्रमश: ललाट में बढी हूई प्रचंण अग्नि के मध्य मृदंग की मंगलकारी उच्च धिम-धिम की ध्वनि के साथ ताण्डव नृत्य में लीन शिव जी सर्व प्रकार सुशोभित हो रहे हैं।

दृषद्विचित्रतल्पयोर्भुजंगमौक्तिकम
स्रजोर्गरिष्ठरत्नलोष्ठयोः सुहृद्विपक्षपक्षयोः।
तृणारविंदचक्षुषोः प्रजामहीमहेन्द्रयोः 
समं प्रवर्तयन्मनः कदा सदाशिवं भजे ॥१२॥
कठोर पत्थर एवं कोमल शय्या, सर्प एवं मोतियों की मालाओं, बहुमूल्य रत्न एवं मिट्टी के टूकडों, शत्रू एवं मित्रों, राजाओं तथा प्रजाओं, तिनकों तथा कमलों पर सामान दृष्टि रखने वाले शिव को मैं भजता हूँ।

कदा निलिंपनिर्झरी निकुञ्जकोटरे वसन्‌ 
विमुक्तदुर्मतिः सदा शिरःस्थमंजलिं वहन्‌।
विमुक्तलोललोचनो ललामभाललग्नकः 
शिवेति मंत्रमुच्चरन्‌ कदा सुखी भवाम्यहम्‌ ॥१३॥
कब मैं गंगा जी के कछारगुञ में निवास करता हुआ, निष्कपट हो, सिर पर अंजली धारण कर चंचल नेत्रों तथा ललाट वाले शिव जी का मंत्रोच्चार करते हुए अक्षय सुख को प्राप्त करूंगा।

निलिम्प नाथनागरी कदम्ब मौलमल्लिका-
निगुम्फनिर्भक्षरन्म धूष्णिकामनोहरः।
तनोतु नो मनोमुदं विनोदिनींमहनिशं 
परिश्रय परं पदं तदंगजत्विषां चयः ॥१४॥
देवांगनाओं के सिर में गूँथे पुष्पों की मालाओं के झड़ते हुए सुगंधमय पराग से मनोहर, परम शोभा के धाम महादेवजी के अंगों की सुंदरताएँ परमानंदयुक्त हमारेमन की प्रसन्नता को सर्वदा बढ़ाती रहें।

प्रचण्ड वाडवानल प्रभाशुभप्रचारणी 
महाष्टसिद्धिकामिनी जनावहूत जल्पना
विमुक्त वाम लोचनो विवाहकालिकध्वनिः 
शिवेति मन्त्रभूषगो जगज्जयाय जायताम्‌ ॥१५॥
प्रचंड बड़वानल की भाँति पापों को भस्म करने में स्त्री स्वरूपिणी अणिमादिक अष्ट महासिद्धियों तथा चंचल नेत्रों वाली देवकन्याओं से शिव विवाह समय में गान की गई मंगलध्वनि सब मंत्रों में परमश्रेष्ठ शिव मंत्र से पूरित, सांसारिक दुःखों को नष्ट कर विजय पाएँ।

इमं हि नित्यमेव मुक्तमुक्तमोत्तम 
स्तवं पठन्स्मरन्‌ ब्रुवन्नरो विशुद्धमेति संततम्‌।
हरे गुरौ सुभक्तिमाशु याति नान्यथागतिं 
विमोहनं हि देहनां सुशंकरस्य चिंतनम ॥१६॥
इस उत्त्मोत्त्म शिव ताण्डव स्त्रोत को नित्य पढने या श्रवण करने मात्र से प्राणि पवित्र हो, परंगुरू शिव में स्थापित हो जाता है तथा सभी प्रकार के भ्रमों से मुक्त हो जाता है।

पूजाऽवसानसमये दशवक्रत्रगीतं 
यः शम्भूपूजनपरम पठति प्रदोषे।
तस्य स्थिरां रथगजेंद्रतुरंगयुक्तां 
लक्ष्मी सदैव सुमुखीं प्रददाति शम्भुः ॥१७॥
प्रात: शिवपुजन के अंत में इस रावणकृत शिवताण्डवस्तोत्र के गान से लक्ष्मी स्थिर रहती हैं तथा भक्त रथ, गज, घोडा आदि सम्पदा से सर्वदा युक्त रहता है।
॥ इति रावणकृतं शिव ताण्डव स्तोत्रं संपूर्णम्‌ ॥

रविवार, 5 जुलाई 2015

।। बिल्वाष्टकम् ।।



विल्व पत्र महादेव को अत्यन्त प्रिय है, विल्व पत्र उनको अर्पण किये बिना उनकी उपासना अधूरी है ।






त्रिदलं त्रिगुणाकारं त्रिनेत्रं च त्रयायुधम ।
त्रिजन्मपापसहांरं मेकबिल्वं शिवार्पणम ॥1

त्रिशाखै बिल्वपत्रश्र्च ह्यच्छिद्र कोमलै: शुभै ।
शिवपूजां करिष्यामि ह्येक्बिल्वं शिवार्पणम ॥2

अखण्डबिल्वपत्रेण पूजिते नन्दिकेश्वरे ।
शुद्ध्यन्ति सर्वपापेभ्यो ह्येकबिल्वं शिवार्पणम ॥3

शालिग्रामशिलामेकां विप्राणां जातु अर्पयेत ।
सोमयज्ञ-महापुण्यमेकिबल्वं शिवार्पणम ॥4

दन्तिकोटि सहस्त्राणि वाजपेयशतानि च ।
कोटिकन्या - महादानमेकबिल्वं शिवार्पणम ॥5

लक्ष्मया: स्तनत उत्पन्नं महादेवस्य च प्रियम ।
बिल्वंवृक्षं प्रयच्छामि ह्येकबिल्वं शिवार्पणम ॥6

दर्शनं बिल्ववृक्षस्य स्पर्शनं पापनाशनम ।
अधोरपापसंहार मेकबिल्वं शिवार्पणम ॥7

मूलतो ब्रह्मरूपाय मध्यतो विष्णुरूपिणे ।
अग्रत: शिवरूपाय ह्येकबिल्वं शिवार्पणम ॥8

बिल्वाष्टकमिदं पुण्यं य: पठेतच्छिवसंनिद्धधौ 
सर्वपाप विनिर्मुक्तः शिवलोकमवाप्नुयात्‌॥
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